सुप्रीम कोर्ट ने कहा ‘महाकाल के सामने कोई VIP नहीं’, सुनवाई से इनकार

विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग उज्जैन महाकाल धाम में गर्भगृह में VIP के प्रवेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी मांग मंदिर प्रशासन के सामने रखने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि महाकाल के सामने कोई भी VIP नहीं हैकोर्ट ने कहा कि मंदिर के गर्भगृह मे कौन जाएगा कौन नहीं? ये फैसला अदालते क्यों करें, आप मंदिर प्रशासन से अपनी बात रख सकते है। 

VIP Darshan Mahakaleshwar Temple
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महाकाल के सामने कोई वीआईपी नहीं 

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वो अपनी मांग मंदिर प्रशासन  के सामने रखें…कोर्ट ने कहा कि विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल के सामने सब बराबर है कोई विशेष दर्जा वाला नहीं होता। गर्भगृह में प्रवेश का नियम तय करने का अधिकार मंदिर कमेटी और जिला प्रशासन के पास है, अदालत इसमें क्यों हस्तक्षेप करे?

VIP Darshan Mahakaleshwar Temple
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याचिकाकर्ता का आरोप

 वहीं सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता का कहना है कि महाकाल दर्शन मे इस तरह के नियम समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। गर्भ गृह में प्रवेश बीते ढाई वर्षों से बंद है, लेकिन इस बीच आरोप है कि नियमों को ताक पर रख वीआईपी एंट्री दी जाती है  

इंदौर बेंच ने भी खारिज कर दी थी याचिका

 

इस सुनवाई से पहले अगस्त 2025 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भी इसी तरह की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि गर्भगृह में प्रवेश का फैसला उज्जैन के जिला कलेक्टर और महाकाल मंदिर प्रशासक को ही करना है, अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

 

कोरोना काल से बंद है गर्भगृह में प्रवेश

आपको बता दें कि महाकाल दरबार में कोरोना काल के बाद से गर्भगृह में आम दर्शन बंद हैं। श्रद्धालु बाहरी क्षेत्र से ही भगवान महाकाल के दर्शन कर पाते हैं। हालांकि कई बार वीआईपी नेता और प्रभावशाली व्यक्तियों को विशेष अनुमति से गर्भगृह में प्रवेश की खबरें सामने आती रही हैं, जिससे आम भक्तों में नाराजगी बनी हुई है

VIP दर्शन पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब याचिकाकर्ता को मंदिर प्रशासन से बातचीत करनी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्थलों के आंतरिक नियमों और प्रबंधन में अदालत का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। इस फैसले से मंदिर प्रशासन पर दबाव बढ़ सकता है कि वह नियमों को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से लागू करे।

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